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कुर्सी बदली, फाइलें खुलीं… और विकास ने पकड़ी रफ्तार! पिंटू ने संभाली PWD की कमान तो 4 महीने से खामोश ऑडिटोरियम में लौटी हलचल


नगर निगम में कुर्सी वही, विभाग वही और फाइलें भी वही… मगर प्रभारी बदला तो तस्वीर बदलती नज़र आने लगी। PWD की जिम्मेदारी विजय मोटवानी से हटाकर युगल किशोर उर्फ पिंटू यादव को सौंपे जाने के बाद लंबे समय से ठहरे निर्माण कार्यों की फाइलें खुलनी शुरू हुईं और करीब चार महीने से बंद पड़े साढ़े तीन करोड़ रुपये के ऑडिटोरियम निर्माण में फिर हलचल लौट आई...... जिस निर्माण स्थल पर महीनों से सन्नाटा पसरा था, वहां दोबारा काम शुरू होना अब नगर निगम के गलियारों में चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है...... मेयर रामू रोहरा के दिशा-निर्देश पर नए प्रभारी ने लंबित कामों का हिसाब खंगाला, स्थिति जानी और काम जल्द शुरू कराने के निर्देश दिए...... इसके बाद सवालों की एक पूरी कतार खड़ी हो गई—आखिर करोड़ों का ऑडिटोरियम चार महीने तक क्यों ठहरा रहा ? इसकी जानकारी समय रहते सामने क्यों नहीं आई ? निगरानी में कमी कहां रही ? और सबसे बड़ा सवाल—जिस काम में नई कमान संभलते ही हरकत दिखाई देने लगी, वह पहले किस वजह से अटका हुआ था ? PWD में हुए इस बदलाव के बाद ऑडिटोरियम का काम दोबारा शुरू होना इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि बताया जा रहा है इसके लंबे समय से बंद होने की जानकारी पूर्व प्रभारी स्तर से सामने नहीं आई थी..... ऐसे में अब विभागीय निगरानी और लंबित निर्माण कार्यों की समीक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं...... कहानी में दूसरा मोड़ सड़क निर्माण को लेकर है...... करीब 3.5 करोड़ रुपये की लागत वाले सड़क निर्माण कार्य को दीवाली के बाद शुरू कराने का दावा पूर्व प्रभारी विजय मोटवानी की ओर से किया गया था...... लेकिन इसी बीच सड़क निर्माण के लिए अंतर की अतिरिक्त राशि की मांग शासन से किए जाने की बात सामने आई है..... अब सवाल सीधा है—जब अतिरिक्त राशि की व्यवस्था ही प्रक्रिया में है, तो दीवाली के बाद काम शुरू कराने की समय-सीमा आखिर किस आधार पर तय की गई थी ? क्या आवश्यक वित्तीय स्थिति पहले ही स्पष्ट थी, या घोषणा उम्मीद के भरोसे कर दी गई थी ? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना अभी बाकी है....... इधर, नए PWD प्रभारी पिंटू यादव की सक्रियता के बाद लंबित कार्यों को लेकर विभाग में हलचल बढ़ी है..... मेयर रामू रोहरा पहले से शहर के वार्डों और बड़े निर्माण कार्यों को गति देने पर जोर देते रहे हैं..... ऐसे में नई जिम्मेदारी के साथ अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह तेजी आगे भी बरकरार रहती है या नहीं.......

फिलहाल तस्वीर दिलचस्प है—
चार महीने का सन्नाटा टूटा है… बंद फाइलें खुली हैं… निर्माण स्थल पर फिर काम दिखाई दे रहा है… और PWD की बदली हुई कुर्सी अपने पीछे एक बड़ा सवाल छोड़ रही है—
 जब काम अब चल सकता है… तो चार महीने तक रुका क्यों था ? 

नगर निगम में फिलहाल चर्चा चेहरे बदलने से ज्यादा काम की रफ्तार बदलने की है..... क्योंकि आखिरकार शहर को दावों और फाइलों से नहीं, जमीन पर उतरते विकास से मतलब है।



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