धमतरी नगर निगम की सियासत इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां मुस्कुराहटों के पीछे कई अनकहे सवाल धीरे-धीरे सिर उठाने लगे हैं..... एक ओर महापौर रामू रोहरा अपनी सहजता, सादगी, सौम्य स्वभाव और सभी पार्षदों को साथ लेकर चलने की कार्यशैली के लिए लगातार चर्चा में हैं.... सत्ता और विपक्ष का भेद किए बिना हर जनप्रतिनिधि को सम्मान देना, उनकी बात गंभीरता से सुनना और विकास को सामूहिक जिम्मेदारी मानना उनकी पहचान बन चुकी है.... लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू अब निगम के भीतर हलचल पैदा कर रहा है...... बताया जा रहा है महापौर की समावेशी सोच के विपरीत, एमआईसी के कुछ प्रभारी अपने व्यवहार और कार्यशैली से अलग ही संदेश देते नजर आ रहे हैं..... आरोप हैं कि उनकी तवज्जो केवल कुछ चुनिंदा पार्षदों तक सीमित रह जाती है, जबकि अन्य जनप्रतिनिधियों को वह सम्मान और सहयोग नहीं मिल पा रहा जिसकी वे अपेक्षा रखते हैं.... यही वजह है कि निगम के गलियारों में अब दबे स्वर में असंतोष की चर्चाएं भी सुनाई देने लगी हैं।
महापौर की सोच पर कहीं भारी तो नहीं पड़ रही कुछ लोगों की मनमानी ?
नगर निगम से जुड़े कई लोगों का मानना है महापौर रामू रोहरा हमेशा से सभी पार्षदों को समान दृष्टि से देखने की कोशिश करते रहे हैं..... चाहे किसी भी वार्ड का प्रतिनिधि हो, वे हर किसी की समस्या सुनते हैं, सुझावों को महत्व देते हैं और विकास कार्यों में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं..... लेकिन चर्चा यह भी है कि एमआईसी के कुछ प्रभारियों का रवैया इस भावना के अनुरूप दिखाई नहीं देता..... कई पार्षदों का कहना है कि जब वे अपने वार्ड से जुड़े विषय लेकर पहुंचते हैं, तो उन्हें अपेक्षित गंभीरता नहीं मिलती..... वहीं कुछ खास लोगों के प्रस्तावों और मांगों पर तत्काल कार्रवाई होती दिखाई देती है।
जब सम्मान में फर्क दिखे, तो मन में दूरी आना स्वाभाविक
राजनीति केवल पदों का खेल नहीं, बल्कि विश्वास और सम्मान का रिश्ता भी होती है.... यदि किसी जनप्रतिनिधि को यह महसूस होने लगे कि उसकी बात को महत्व नहीं दिया जा रहा या उसके साथ समान व्यवहार नहीं हो रहा, तो स्वाभाविक रूप से उसके मन में उपेक्षा की भावना जन्म लेने लगती है.... नगर निगम जैसे संस्थान में, जहां हर वार्ड और हर पार्षद जनता की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करता है, वहां किसी भी प्रकार का भेदभाव या पक्षपात टीम भावना को कमजोर कर सकता है।
विकास तभी संभव, जब हर आवाज़ को मिले बराबर अहमियत
नगर निगम का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति या कुछ चुनिंदा लोगों का नहीं, बल्कि पूरे शहर का विकास है..... ऐसे में आवश्यक है कि हर पार्षद को बराबर सम्मान मिले, उनकी बात सुनी जाए और विकास योजनाओं में समान भागीदारी दी जाए.... यदि महापौर की समावेशी सोच को निगम के सभी जिम्मेदार पदाधिकारी भी पूरी ईमानदारी से अपनाएं, तो न केवल आंतरिक समन्वय मजबूत होगा, बल्कि विकास कार्य भी अधिक गति और प्रभाव के साथ आगे बढ़ेंगे।
सबकी निगाहें अब एक सवाल पर...
क्या महापौर रामू रोहरा तक यह संदेश पहुंचेगा और वे इस बढ़ती नाराज़गी को दूर करने के लिए कोई पहल करेंगे, या फिर निगम के भीतर उठ रही यह खामोश टीस आने वाले समय में खुलकर सामने आएगी ? क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत पद नहीं, बल्कि सम्मान होता है... और जब सम्मान सबको बराबर मिले, तभी विकास की तस्वीर भी सच मायनों में मुकम्मल बनती है।





