स्वाधीनता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर जारी एक विज्ञापन अब सियासी चर्चा का गर्म मुद्दा बन गया है..... वजह बेहद सीधी, लेकिन सवाल बेहद गहरे हैं—विज्ञापन में भाजपा के पार्षदों की तस्वीरें बाकायदा लगाई गईं, लेकिन मेयर की तस्वीर गायब कर दी गई! आखिर ऐसा क्यों हुआ ? यह महज डिजाइन की चूक थी, भूल थी या फिर पर्दे के पीछे कोई ऐसी कहानी थी, जिसने संगठन को भी गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया ? विज्ञापन सामने आते ही भाजपा के भीतर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। सवाल उठने लगे कि जब पार्षदों की तस्वीरें शामिल की गईं, तो फिर मेयर की तस्वीर आखिर क्यों नहीं ? क्या तस्वीर लगाना-हटाना किसी की मर्जी से हुआ ? किसने विज्ञापन को अंतिम रूप दिया ? और सबसे बड़ा सवाल—क्या संगठन की जानकारी के बिना यह पूरा खेल खेला गया ?
बवाल मचा तो संगठन ने संभाली कमान
मामला तूल पकड़ने के बाद संगठन ने भाजपा पार्षदों की बैठक लेकर वन-टू-वन बातचीत की...... एक-एक कर सवाल पूछे गए और पूरे घटनाक्रम की तह तक जाने की कोशिश हुई..... किसकी क्या भूमिका थी, किसे क्या जानकारी थी और विज्ञापन के अंतिम स्वरूप तक तस्वीरें कैसे पहुंचीं—इन तमाम सवालों पर अंदरखाने पड़ताल की गई..... जैसे-जैसे पूछताछ आगे बढ़ी, मामला साधारण गलती से कहीं ज्यादा गंभीर नजर आने की चर्चा तेज हो गई.....
लागा चुनरी में दाग… छुपाऊँ कैसे,
अपनों से नजरें मिलाऊँ कैसे…
यही पंक्तियां अब इस पूरे सियासी घटनाक्रम पर सटीक बैठती नजर आ रही हैं....
नीला मिठा की भूमिका पर भी उठे सवाल!
सूत्रों के मुताबिक संगठन की पड़ताल में नीला मीठा की भूमिका भी संदिग्ध बताए जाने की चर्चा है...… हालांकि इस संबंध में संगठन की ओर से कोई आधिकारिक निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन अंदरखाने सामने आए तथ्यों और बयानों को लेकर मंथन जारी है.... बताया जा रहा है कि कुछ ऐसे प्रमाण और तथ्य सामने आए हैं, जिन्हें संगठन गंभीरता से देख रहा है...... यही वजह है कि अब मामला केवल नाराजगी तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि संगठनात्मक कार्रवाई की संभावनाओं को लेकर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है....
बात थाने तक पहुंचाने की भी चली चर्चा
विवाद इतना बढ़ा कि बैठक के दौरान मामला थाने तक ले जाने की बात भी सामने आने की चर्चा है..... लेकिन बाद में संगठन के स्तर पर ही मामले को संभालने की कोशिश हुई....
कहानी ने यहां एक और मोड़ लिया— घर की बात है… घर में ही रहने दो
लेकिन सवाल यह है क्या घर की चारदीवारी में मामला सचमुच शांत हो जाएगा ? या फिर संगठन की तहकीकात के बाद कोई ऐसा फैसला आएगा, जो इस पूरे विवाद को नई दिशा दे देगा ?
किसने हटाई मेयर की तस्वीर ? यही सबसे बड़ा सवाल!
पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा रहस्य अब यही है— जब भाजपा पार्षदों की तस्वीरें विज्ञापन में लगाई गईं, तो मेयर की तस्वीर आखिर किसने हटाई ?
अगर यह भूल थी तो सिर्फ मेयर की तस्वीर ही क्यों गायब हुई ?
अगर तकनीकी गलती थी तो पार्षदों की तस्वीरें कैसे बचीं ?
और अगर किसी की भूमिका थी, तो क्या संगठन तक उसका प्रमाण पहुंच चुका है ? फिलहाल इन सवालों के जवाब बंद कमरों में तलाशे जा रहे हैं..... कुछ लोग मामले को गोल-मोल कर शांत कराने की कोशिश में बताए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर संगठन स्तर पर कार्रवाई की सुगबुगाहट भी तेज है..... तस्वीर भले ही एक विज्ञापन से गायब हुई हो… लेकिन उसके बाद उठे सवाल अब तस्वीर से कहीं बड़े हो गए हैं.... अब देखना होगा—मेयर की तस्वीर गायब करने की यह कहानी महज एक भूल साबित होती है या संगठन के भीतर किसी चेहरे पर कार्रवाई की नई पटकथा लिखती है?
कहानी जारी है… पर्दा अभी पूरी तरह उठा नहीं है।




