जिस दफ्तर में लोगों की जमीन और जिंदगी से जुड़े काम आसानी से पूरे होने चाहिए, वहीं अगर दिव्यांग व्यक्ति अपनी मजबूरी को पीछे छोड़कर सीढ़ियां चढ़े, सुबह से शाम तक साहब का इंतजार करे और आखिर में खाली हाथ लौट जाए, तो सवाल सिर्फ एक सरकारी काम की देरी का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की संवेदनशीलता का बन जाता है...... धमतरी के नजूल दफ्तर में कुछ ऐसा ही मंजर सामने आने की बात कही जा रही है..... दूर-दराज से अपने जरूरी काम लेकर पहुंचे लोग सुबह से अधिकारी के आने का इंतजार करते रहे.... इनमें दिव्यांग और बुजुर्ग लोग भी शामिल बताए जा रहे हैं, जिन्हें दफ्तर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों की मुश्किल पार करनी पड़ रही है..... ऊपर पहुंचने के बाद भी राहत नहीं—उमस वाली गर्मी, बेचैनी और बिना पंखे के घंटों इंतजार..... लोगों की उम्मीद थी कि आज काम होगा... फाइल आगे बढ़ेगी... परेशानी खत्म होगी.... लेकिन दिन ढलते-ढलते इंतजार की कहानी फिर वहीं पहुंच गई— साहब आज मौजूद नहीं रहेंगे... अगली तारीख में आइए.....
एक दिन नहीं... तारीखों का सिलसिला कब खत्म होगा ?
फरियादियों का कथित आरोप है नजूल से जुड़े जरूरी कामों के लिए उन्हें बार-बार दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं...... कोई नामांतरण के लिए परेशान है, कोई बटांकन के लिए, किसी को फौती दर्ज करानी है तो कोई बंटवारे की कार्रवाई आगे बढ़ने का इंतजार कर रहा है.... हर किसी की अपनी मजबूरी है, लेकिन कथित तौर पर समस्या एक ही—काम कब होगा, इसकी कोई साफ तस्वीर नहीं.... सुबह जल्दी पहुंचकर लोग दफ्तर में बैठते हैं.... घंटों गुजर जाते हैं... उम्मीद बनी रहती है अधिकारी आएंगे और फाइल पर कार्रवाई होगी..... लेकिन शाम होते-होते अगर अधिकारी की गैरमौजूदगी की खबर मिल जाए, तो पूरे दिन का इंतजार बेकार चला जाता है।
दिव्यांगों के लिए सीढ़ियां बनीं मजबूरी की सीढ़ियां!
सबसे मार्मिक तस्वीर उन दिव्यांग लोगों की है, जिन्हें अपने जरूरी राजस्व काम के लिए सीढ़ियां चढ़कर दफ्तर पहुंचना पड़ रहा है.... एक तरफ शरीर साथ नहीं देता, दूसरी तरफ सरकारी काम की मजबूरी उन्हें घर बैठने नहीं देती..... किसी तरह दफ्तर पहुंचते हैं, फिर घंटों बैठकर इंतजार करते हैं..... ऐसे में सवाल उठता है क्या दिव्यांग और बुजुर्गों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जिससे उन्हें बार-बार दफ्तर की सीढ़ियां और चक्कर न लगाने पड़ें ?
उमस में बेहाल लोग... पंखे का इंतजार भी खत्म नहीं!
नजूल दफ्तर में इंतजार कर रहे लोगों की परेशानी सिर्फ अधिकारी की गैरमौजूदगी तक सीमित नहीं बताई जा रही.... उमस भरी गर्मी में बिना पर्याप्त हवा-पंखे के बैठे फरियादियों की हालत भी सवाल खड़े करती है..... किसी के हाथ में जमीन के कागजात हैं, किसी के पास पुरानी फाइल, कोई अपने परिवार के बंटवारे का मामला लेकर आया है..... हर चेहरा इस उम्मीद में है आज उसका काम हो जाएगा..... लेकिन जब शाम को फिर अगली तारीख मिलती है, तो मायूसी साफ दिखाई देती है.....
राजस्व मीटिंग की नसीहत... फिर धमतरी में ये हाल क्यों ?
राजस्व प्रकरणों के त्वरित निराकरण और आम लोगों को राहत देने के लिए बैठकों में अधिकारियों को समयबद्ध कार्रवाई की नसीहत दी जाती रही है...... ऐसे में नजूल दफ्तर में सामने आ रही कथित स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है..... क्या जिम्मेदार अधिकारी इस परेशानी से वाकिफ हैं ?..... क्या दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए कोई आसान व्यवस्था हो ?..... अगर अधिकारी मौजूद नहीं रहेंगे तो लोगों को पहले से सूचना क्यों नहीं दी जाती ?.... और आखिर नामांतरण, बटांकन, फौती, एनओसी और बंटवारे जैसे कामों के लिए आम आदमी कब तक तारीखों के चक्कर काटता रहेगा ? लोगों को अब सिर्फ आश्वासन नहीं, काम का समय और राहत की व्यवस्था चाहिए..... वरना नजूल दफ्तर की सीढ़ियों पर बैठा हर परेशान चेहरा यही सवाल करता रहेगा— साहब कब आएंगे... और हमारा काम कब होगा ?





