रायपुर/धमतरी।
पद चला गया… जिम्मेदारी बदल गई… वक्त के साथ हालात भी बदल गए… लेकिन क्या वर्षों पहले खतरे के आधार पर मिला भारी-भरकम सुरक्षा घेरा भी बदलते हालात के साथ बदला है ? 27 अक्टूबर को हमने इसी सवाल के साथ सुरक्षा या स्टेटस सिंबल ? शीर्षक से खबर प्रकाशित कर PSO की तैनाती, सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और बदलते थ्रेट परसेप्शन के आधार पर सुरक्षा की नियमित समीक्षा का गंभीर मुद्दा उठाया था...... अब महज दो दिन बाद छत्तीसगढ़ की सियासत में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है..... बस्तर क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस से जुड़े कुल 116 नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा कर श्रेणियों में बदलाव का फैसला लिया गया है..... उपलब्ध जानकारी के मुताबिक कई नेताओं की सुरक्षा में एक स्तर की कटौती की जा रही है—कहीं Z+ से Z, तो कहीं दूसरी श्रेणियों में बदलाव की बात सामने आई है..... विस्तृत तस्वीर गृह विभाग का आधिकारिक आदेश सामने आने के बाद और साफ होगी..... यह फैसला इसलिए भी बेहद अहम है, क्योंकि इसने उसी बुनियादी सवाल को फिर चर्चा के बीच ला खड़ा किया है—सुरक्षा किसी नेता की शान, रुतबे और सियासी रसूख की निशानी है या मौजूदा खतरे के मुताबिक मिलने वाली सरकारी हिफाज़त ? प्रदेश के गृह विभाग द्वारा नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था को मौजूदा हालात और थ्रेट परसेप्शन के आधार पर परखे जाने की बात सामने आई है...... बस्तर में बदले सुरक्षा हालात के बीच सुरक्षा श्रेणियों में बदलाव का फैसला अब प्रदेश की राजनीति में नई बहस को जन्म दे रहा है..... खास बात यह है इस फैसले की जद में केवल सत्ता या केवल विपक्ष नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों से जुड़े नेता आए हैं..... यानी सुरक्षा की समीक्षा को राजनीतिक दल से अलग रखते हुए खतरे के मौजूदा आकलन से जोड़कर देखा जा रहा है।
27 अक्टूबर को उठा था सवाल… अब घटनाक्रम ने बहस को दी नई धार
हमने अपनी 27 अक्टूबर की खबर में यही सवाल उठाया था यदि किसी पूर्व जनप्रतिनिधि की जान को वास्तविक और गंभीर खतरा है तो उसकी हिफाज़त में कोई समझौता नहीं होना चाहिए..... लेकिन यदि परिस्थितियां बदल चुकी हैं और खतरे का स्तर कम हुआ है, तो क्या वर्षों पहले तय हुई सुरक्षा व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा नहीं होनी चाहिए ? कहीं 3 तो कहीं 4 PSO तक तैनात होने की चर्चाओं के बीच सवाल सुरक्षा देने का नहीं, बल्कि यह जानने का था कि आज की तारीख में खतरा कितना है और उसके मुकाबले सरकारी सुरक्षा कितनी जरूरी है ? अब बस्तर के 116 नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव के फैसले ने इसी सवाल को और बड़ा कर दिया है....
बस्तर के बाद अब धमतरी सहित बाकी जिलों पर निगाहें
और यहीं से अब इस पूरे घटनाक्रम का अगला और बेहद अहम सवाल निकलता है—क्या सुरक्षा समीक्षा का यह सिलसिला केवल बस्तर तक सीमित रहेगा या अब धमतरी सहित छत्तीसगढ़ के बाकी जिलों में भी वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों को मिले सुरक्षा घेरे की फाइलें नए सिरे से खुलेंगी ? धमतरी में किस वर्तमान अथवा पूर्व जनप्रतिनिधि को PSO मिले हैं ? उनकी सुरक्षा का आखिरी थ्रेट असेसमेंट कब हुआ ? वर्षों पहले जिस खतरे के आधार पर सुरक्षा दी गई थी, क्या वह खतरा आज भी उसी स्तर पर मौजूद है ? और यदि परिस्थितियां बदल चुकी हैं तो क्या सुरक्षा जवानों की संख्या भी मौजूदा जरूरत के मुताबिक तय की जायेगी ? बस्तर में 116 नेताओं की सुरक्षा पर लिए गए फैसले के बाद अब ये सवाल केवल धमतरी ही नहीं, बल्कि प्रदेश के दूसरे जिलों में भी मौजूदा और पूर्व जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उठ सकते हैं।
एक PSO का मतलब सिर्फ एक जवान नहीं…
इस पूरे मामले का दूसरा पहलू पुलिस महकमे से जुड़ा है..... थानों से लेकर पेट्रोलिंग, अपराध नियंत्रण, जांच और कानून-व्यवस्था तक जवानों की जरूरत लगातार बनी रहती है..... ऐसे में यदि किसी ऐसी सुरक्षा ड्यूटी में अतिरिक्त जवान लगे हों, जहां मौजूदा खतरे के हिसाब से उनकी जरूरत कम हो चुकी है, तो उनकी तैनाती की समीक्षा करके मैदानी पुलिसिंग और आम जनता की सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है..... इतना ही नहीं, कुछ पूर्व जनप्रतिनिधियों के साथ तैनात सुरक्षा जवानों से उनके मूल सुरक्षा दायित्व से अलग निजी काम लिए जाने के आरोप और चर्चाएं भी सामने आती रही हैं..... कहीं निजी काम तो कहीं छुट्टियों और दूसरे खर्चों को लेकर सवाल उठते रहे हैं..... हालांकि ऐसे आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि जरूरी है.... यदि ऐसी शिकायतें कहीं सही पाई जाती हैं तो मामला केवल सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि सुरक्षा में तैनात जवानों के सम्मान, अधिकार और उनके मूल दायित्व का भी है।
सुरक्षा घटाना मकसद नहीं… जरूरत के मुताबिक सुरक्षा हो, सवाल सिर्फ इतना
यह मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष की सुरक्षा वापस लेने का नहीं है..... जिसे वास्तविक खतरा है, उसकी हिफाज़त में कोई समझौता नहीं होना चाहिए..... जरूरत पड़े तो सुरक्षा बढ़ाई भी जानी चाहिए...... लेकिन सुरक्षा किसी की शान या स्टेटस सिंबल भी नहीं बननी चाहिए...... खतरा घटा है तो सुरक्षा की समीक्षा और खतरा बढ़ा है तो सुरक्षा में इजाफा—व्यवस्था का आधार मौजूदा थ्रेट असेसमेंट होना चाहिए..... अब बस्तर में 116 नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा के बाद सवाल और सीधा हो गया है— क्या यही पैमाना धमतरी सहित पूरे छत्तीसगढ़ में लागू होगा ? क्या वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों के सुरक्षा घेरे की नियमित समीक्षा होगी ? क्या यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होगा कि सुरक्षा का आखिरी आकलन कब किया गया था और मौजूदा खतरे के हिसाब से कितने जवान वास्तव में जरूरी हैं ?
27 अक्टूबर को सवाल था— सुरक्षा या स्टेटस सिंबल ? आज बस्तर से सामने आया फैसला उस बहस को एक नया मोड़ दे रहा है...... और अब निगाह धमतरी सहित बाकी जिलों पर है—क्या यहां भी वर्षों पुराने सुरक्षा घेरों की समीक्षा होगी, या बस्तर में चली समीक्षा की कैंची वहीं थम जाएगी ?





