पद चला गया… जिम्मेदारी बदल गई… वक्त के साथ हालात भी बदल गए… लेकिन क्या वर्षों पहले खतरे के आधार पर मिला भारी-भरकम सुरक्षा घेरा भी बदलते हालात के साथ बदला है ? यही सवाल अब कुछ पूर्व जनप्रतिनिधियों को मिल रही सुरक्षा को लेकर उठने लगा है....... कहीं 3 तो कहीं 4 PSO तक तैनात होने की चर्चा है...... ऐसे में सवाल सुरक्षा देने का नहीं, बल्कि यह जानने का है कि आज की तारीख में खतरा कितना है और उसके मुकाबले सरकारी सुरक्षा कितनी जरूरी है ? सुरक्षा किसी की शान, रुतबा या सियासी रसूख का पैमाना नहीं, बल्कि खतरे से बचाने की बेहद संजीदा व्यवस्था है...... अगर किसी पूर्व जनप्रतिनिधि की जान को वास्तविक और गंभीर खतरा है तो उसे पूरी सुरक्षा मिलनी ही चाहिए...... लेकिन यदि परिस्थितियां बदल चुकी हैं और खतरे का स्तर कम हुआ है, तो क्या वर्षों पुरानी सुरक्षा व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा नहीं होनी चाहिए ? नक्सल मोर्चे पर बदले हालात ने इस सवाल को और बड़ा कर दिया है...... सरकार स्वयं राजनीतिक व्यक्तियों और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा को मौजूदा थ्रेट परसेप्शन के आधार पर परखने की बात कह चुकी है...... ऐसे में पूर्व जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर भी सवाल स्वाभाविक है—क्या हर पूर्व जनप्रतिनिधि के सुरक्षा घेरे की नियमित समीक्षा हो रही है ? अगर हो रही है तो 3–4 PSO की जरूरत किन परिस्थितियों में बरकरार है ? इस पूरे मामले का दूसरा पहलू पुलिस महकमे से जुड़ा है..... थानों से लेकर पेट्रोलिंग, अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था तक जवानों की जरूरत बनी रहती है...... ऐसे में यदि किसी ऐसी सुरक्षा ड्यूटी में अतिरिक्त जवान लगे हों, जहां मौजूदा खतरे के हिसाब से उनकी जरूरत कम हो चुकी है, तो उनकी तैनाती की समीक्षा करके मैदानी पुलिसिंग को मजबूत किया जा सकता है...... इतना ही नहीं, कुछ पूर्व जनप्रतिनिधियों के साथ तैनात सुरक्षा जवानों से उनके मूल सुरक्षा दायित्व से अलग काम लिए जाने के आरोप और चर्चाएं भी सामने आ रही हैं....... कहीं निजी काम कराने तो कहीं छुट्टियों और दूसरे खर्चों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है...... यदि ऐसी शिकायतें सही पाई जाती हैं तो मामला केवल सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि सुरक्षा में तैनात जवानों के सम्मान और अधिकारों का भी होगा...... सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि एक सुरक्षा जवान की तैनाती के पीछे सिर्फ उसका वेतन नहीं, बल्कि पूरी सरकारी व्यवस्था और मानव संसाधन जुड़ा होता है...... ऐसे में यह जानना जरूरी है कि पूर्व जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर कुल कितने पुलिसकर्मी तैनात हैं, उनकी सुरक्षा की आखिरी समीक्षा कब हुई और मौजूदा खतरे का स्तर क्या है ? यह मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष की सुरक्षा वापस लेने का नहीं है.... जिसे वास्तविक खतरा है, उसकी हिफाज़त में कोई समझौता नहीं होना चाहिए...... सवाल केवल इतना है कि जहां खतरा कम हो चुका है, वहां क्या सुरक्षा में लगे अतिरिक्त जवानों को वापस लेकर आम जनता की सुरक्षा में लगाया जा सकता है?
अब सवाल व्यवस्था से है—
क्या पूर्व जनप्रतिनिधियों को मिली सुरक्षा की नए सिरे से समीक्षा होगी ? क्या PSO की जरूरत का मौजूदा खतरे के आधार पर आकलन किया जाएगा ? और क्या सुरक्षा जवानों से निजी काम लिए जाने जैसी शिकायतों की जांच होगी ? क्योंकि सुरक्षा जरूरत है, सुविधा नहीं… हिफाज़त है, हैसियत दिखाने का जरिया नहीं।




