गंगरेल की खूबसूरत वादियों और पर्यटन की चमक के पीछे आखिर चल क्या रहा है ? यह सवाल केवल सुनी-सुनाई बातों या शिकायतों के आधार पर नहीं उठाया जा रहा..... हमारी टीम ने स्वयं मौके पर पहुंचकर संबंधित इलाके का मुआयना किया, वहां चल रहे निर्माण और उसकी स्थिति को देखा और उसके बाद ही यह मामला समाचार के जरिए सामने लाया जा रहा है..... मौके की तस्वीर कई ऐसे सवाल छोड़ती है, जिनका जवाब अब जिम्मेदार विभागों और जिला प्रशासन से अपेक्षित है..... मामले का सबसे गंभीर पहलू जलभराव क्षेत्र से 50 मीटर की निर्माण सीमा को लेकर है...... बताया जा रहा है जलभराव क्षेत्र से 50 मीटर बाहर ही निर्माण किया जा सकता है और यह दायरा बरदीहा रिसॉर्ट की बाहरी दीवार तक आता है..... लेकिन मौके के मुआयने के दौरान इसके भीतर भी निर्माण होते दिखाई देने का दावा है।
अगर सरकारी सीमांकन और नियम भी यही कहते हैं, तो सवाल बेहद सीधा है—
50 मीटर के भीतर निर्माण किसकी अनुमति से?
पक्की दीवारों को हरी झंडी किसने दी?
नक्शा किसने पास किया?
मौके की जांच किस अधिकारी ने की?
और अनुमति नहीं है तो निर्माण अब तक रुका क्यों नहीं?
20 शर्तें फाइल में... जमीन पर आखिर किसकी चल रही ?
गंगरेल में पर्यटन और वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों के लिए एंटार्कटिका सी वर्ल्ड वाटर स्पोर्ट्स नामक संस्था को अनुमति दिए जाने की बात सामने आई है...... बताया जा रहा है करीब 5 एकड़ जमीन रिसॉर्ट और लगभग 12 एकड़ जमीन डाउन स्ट्रीम क्षेत्र में वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराई गई...... इसके साथ करीब 20 बिंदुओं की शर्तें निर्धारित होने और अस्थाई निर्माण से जुड़े प्रावधान होने की बात भी कही जा रही है..... फिर सवाल उठता है—जब शर्त अस्थाई निर्माण की बताई जा रही है, तो मौके पर पक्के स्वरूप के स्ट्रक्चर क्यों दिखाई दे रहे हैं ? यदि इसकी अलग से वैधानिक अनुमति है तो प्रशासन उसे सार्वजनिक करे...... और यदि अनुमति नहीं है, तो फिर सवाल और गंभीर हो जाता है—निर्माण होता रहा, सामग्री पहुंचती रही, दीवारें उठती रहीं और जिम्मेदार विभाग देखते रहे ?
मीडिया बार-बार उठा रहा सवाल... फिर इतनी मेहरबानी क्यों ?
यह मामला पहली बार सामने नहीं आया है..... मीडिया लगातार निर्माण और नियमों से जुड़े सवाल उठा रहा है.... इसके बावजूद यदि विवादित निर्माण जारी है, तो अब सवाल सिर्फ निर्माण करने वालों से नहीं बल्कि उन जिम्मेदार अफसरों से भी है, जिन पर नियमों का पालन करवाने की जिम्मेदारी है....
क्या अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया ?
क्या 50 मीटर की सीमा का आधिकारिक सीमांकन कराया गया ?
क्या निर्माण और स्वीकृत नक्शे का मिलान हुआ ?
क्या संबंधित संस्था को कोई नोटिस जारी किया गया ?
अगर सब नियमों के मुताबिक है तो दस्तावेज सामने क्यों नहीं रखे जा रहे ? और यदि नियमों का उल्लंघन मिल चुका है तो कार्रवाई आखिर किसके इंतजार में है ?
खतरा गेट से ज्यादा कैचमेंट की अचानक बढ़ती आवक का
गंगरेल करीब 32 टीएमसी क्षमता वाला बड़ा जलाशय है..... बारिश के चरम दौर में इसके विशाल कैचमेंट क्षेत्र से पानी की आवक अचानक कई गुना बढ़ सकती है..... ऐसे समय डाउन स्ट्रीम और आसपास के इलाके में प्राकृतिक बहाव तथा जलस्तर की स्थिति तेजी से बदल सकती है..... इसलिए मुद्दा सिर्फ बांध के गेट खुलने का नहीं है.... असली सवाल है—कैचमेंट से भारी मात्रा में पानी आने की स्थिति को ध्यान में रखकर क्या यहां हो रहे निर्माण का तकनीकी और सुरक्षा परीक्षण किया गया ? यदि किया गया तो उसकी रिपोर्ट कहां है ? और यदि नहीं किया गया, तो संवेदनशील जल क्षेत्र के इतने करीब स्थाई प्रकृति का निर्माण किस भरोसे आगे बढ़ रहा है ?
पर्यटन जरूरी... लेकिन नियमों की कीमत पर क्यों ?
गंगरेल में पर्यटन बढ़ना चाहिए.... वाटर स्पोर्ट्स विकसित हों, रोजगार पैदा हो और मिनी गोवा के रूप में इसकी पहचान और मजबूत हो—लेकिन विकास की इमारत नियमों को किनारे रखकर नहीं खड़ी की जा सकती...... हमारे मौके के मुआयने के बाद सामने आई तस्वीर पर अब प्रशासन को स्पष्ट करना होगा 50 मीटर की वास्तविक सीमा क्या है, 20 शर्तों में निर्माण को लेकर क्या प्रावधान हैं और मौके पर खड़े किए जा रहे स्ट्रक्चर को किस स्तर पर अनुमति मिली है..... क्योंकि सवाल अब सिर्फ कुछ ईंट और पक्की दीवारों का नहीं रहा..... मौका सामने है... निर्माण सामने है... सवाल सामने हैं... और मीडिया लगातार आवाज उठा रहा है..... फिर जिले के जिम्मेदार अफसरों की तरफ से ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही, जिससे तस्वीर साफ हो सके ?
जब 50 मीटर के बाहर निर्माण की सीमा बताई जा रही है... तो उसके भीतर उठती पक्की दीवारों पर आखिर किसकी मेहरबानी है ?
गंगरेल जवाब मांग रहा है... और अब जवाब जिम्मेदारों को देना है।





