दिन ढलता है... शहर की रफ्तार कुछ धीमी पड़ती है... लेकिन इसी के साथ धमतरी की सड़कों पर एक दूसरी रफ्तार शुरू होती हैं..... रात के करीब 9 बजते ही रेत से भरे हाइवा की लंबी कतारें निकलने लगती हैं.... एक के पीछे एक भारी वाहन... दूर से नज़ारा ऐसा, मानो सड़क नहीं बल्कि कोई रेलवे ट्रैक हो और उस पर मालगाड़ी दौड़ रही हो.... लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे ज्यादा चर्चा एक नाम की है— पोरा तिहार !
आरोप और सवाल यह है कुछ हाइवा पर पोरा तिहार का स्टिकर आखिर किस मकसद से लगाया जा रहा है ? क्या इसका किसी वैध अनुमति या प्रशासनिक व्यवस्था से कोई संबंध है, या फिर यह महज पहचान का निशान है ? स्थानीय स्तर पर ऐसी चर्चा है इस स्टिकर वाली गाड़ियों को रोकने-टोकने से परहेज किया जाता है..... हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है..... लेकिन कहानी सिर्फ सड़क पर दौड़ते हाइवा तक सीमित नहीं है..... असली रहस्य रेत डम्प में छिपा होने के आरोप हैं.... रेत के भंडारण के लिए नियमों के तहत अनुमति दी जाती है.... सवाल यह उठ रहा है कहीं इसी वैध व्यवस्था की आड़ में अवैध खनन और परिवहन का खेल तो नहीं चल रहा ? स्थानीय लोगों के आरोपों के मुताबिक, कुछ डम्प से रातभर बड़ी संख्या में हाइवा रेत लेकर निकलते हैं..... यदि लगातार इतनी मात्रा में रेत बाहर जा रही है, तो सामान्य तौर पर डम्प में जमा रेत कम होनी चाहिए....
लेकिन आरोप है यहां गणित कुछ और ही दिखाई देता है....
रातभर गाड़ियां निकलती हैं...
रेत जाती रहती है...
हाइवा की कतार खत्म नहीं होती...
और अगली रात डम्प फिर रेत से भरा दिखाई देता है!
यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू होता है—डम्प से निकली रेत का रिकॉर्ड कितना है ? डम्प में दोबारा पहुंच रही रेत कहां से आ रही है ? उसके परिवहन की अनुमति कहां है? खदान, डम्प और गंतव्य तक की मात्रा का हिसाब आपस में मेल खाता है या नहीं ? अगर दस्तावेज और मौके पर मौजूद स्टॉक का मिलान कर दिया जाए, तो इस पूरे खेल की तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है.... सबसे गंभीर सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि यह सब कथित तौर पर किसी सुनसान सरहद पर नहीं, बल्कि जिला प्रशासन की नाक के नीचे होने की शिकायतें सामने आती रही हैं..... भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर लोग विरोध करते हैं, शहर की सड़कों पर हादसों का डर बना रहता है और रात में तेज रफ्तार भारी वाहनों से आम राहगीरों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा बनती है..... लोगों के बीच यह सवाल भी है कार्रवाई होती है तो आखिर उसका दायरा कितना बड़ा है ? आरोप है कि कभी-कभार दो-चार गाड़ियों पर कार्रवाई कर सरकारी रिकॉर्ड में सख्ती दिखा दी जाती है, जबकि असल नेटवर्क और रातभर चलने वाली कथित सप्लाई पर वैसी चोट नजर नहीं आती....
और फिर वही नाम सामने आता है— पोरा तिहार___
यदि इस नाम या स्टिकर का किसी सरकारी अनुमति से कोई लेना-देना नहीं है, तो प्रशासन को साफ करना चाहिए कि इसे लगाकर चलने वाले हाइवा कौन हैं और इनकी जांच सामान्य वाहनों की तरह हो रही है या नहीं। और यदि इसका कोई अधिकृत उद्देश्य है, तो उसकी जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए, ताकि शक और अफवाह की गुंजाइश खत्म हो..... क्योंकि रेत की इस कहानी में सवाल सिर्फ इतना नहीं कि हाइवा कहां जा रहे हैं... बड़ा सवाल यह है कि रातभर खाली होने के आरोपों के बावजूद डम्प की रेत खत्म क्यों नहीं होती ? क्या वैध डम्प की आड़ में कहीं दूसरा खेल चल रहा है? क्या हर गाड़ी की रॉयल्टी और परिवहन दस्तावेज की जांच हो रही है ? क्या डम्प में आने और बाहर जाने वाली रेत का रोजाना हिसाब दर्ज है ? और सबसे बड़ा सवाल— पोरा तिहार लिखा स्टिकर आखिर सिर्फ एक स्टिकर है... या रात की सड़कों पर कोई ऐसा कथित ‘पास’, जिसकी जांच होना बेहद जरूरी है ? इन सवालों का जवाब अब संबंधित खनिज विभाग, परिवहन विभाग और जिला प्रशासन के आधिकारिक रिकॉर्ड तथा मौके की जांच से ही सामने आ सकता है.... फिलहाल धमतरी की रात में हाइवा दौड़ रहे हैं... रेत निकल रही है... डम्प फिर भरने के आरोप हैं... और जनता के सामने एक सवाल जस का तस खड़ा है—आखिर इस ‘रेत के जादू’ का राज क्या है?





