मंच सजा था... अफसर मौजूद थे... सरकारी योजनाओं और जनसेवा का संदेश देने के लिए सेवा संकल्प का बड़ा आयोजन था...... लेकिन कार्यक्रम की चमक के बीच सम्मान को लेकर उठी एक चिंगारी ने ऐसा माहौल बनाया कि कुछ ही घंटों बाद देर रात प्रशासनिक फेरबदल की खबर ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया..... पहले सरपंचों का मंच छोड़कर जमीन पर बैठ जाना... फिर सिहावा विधायक अंबिका मरकाम का जिला स्तरीय कार्यक्रम में निमंत्रण नहीं मिलने का आरोप... और उसी रात नगरी SDM प्रीति दुर्गम की जगह मनोज कुमार मरकाम को नगरी की जिम्मेदारी सौंप दिया जाना—घटनाओं के इस सिलसिले ने सियासी और प्रशासनिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं..... सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है मनोज कुमार मरकाम को महज एक दिन पहले ही तबादले के बाद धमतरी SDM की जिम्मेदारी दी गई थी.... लेकिन वे धमतरी की नई जिम्मेदारी ठीक से संभाल पाते, उससे पहले ही उन्हें दोबारा नगरी भेजने का आदेश सामने आ गया..... मरकाम पहले भी नगरी SDM रह चुके हैं और इलाके की प्रशासनिक परिस्थितियों से अच्छी तरह वाकिफ माने जाते हैं..... ऐसे में उन्हें फिर नगरी भेजना सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था है या गुरुवार को पैदा हुए हालात के बाद लिया गया फैसला—इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं।
क्या फैसलों में जनप्रतिनिधियों से संवाद कमजोर पड़ रहा है ?
इस अचानक बदलाव के साथ एक और सवाल तेजी से उभर रहा है—क्या महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसलों में जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से संवाद और उन्हें भरोसे में लेने की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है ? एक दिन पहले जिस अधिकारी को धमतरी की जिम्मेदारी दी गई, अगले ही दिन उन्हें वापस नगरी भेज दिया गया...... ऐसे ताबड़तोड़ फैसलों के बीच जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के आपसी तालमेल को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है...... लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधि एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि व्यवस्था की दो अहम कड़ियां हैं..... लेकिन जब मंच पर जनप्रतिनिधियों के सम्मान को लेकर विवाद हो और उसी रात प्रशासनिक कुर्सियों में बड़ा फेरबदल दिखाई दे, तो चर्चा होना लाजिमी है आखिर फैसलों और संवाद के बीच दूरी क्यों दिखाई दे रही है ? क्या जिले में अफसरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच फासला बढ़ रहा है, या यह महज संयोग और सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है ?
मंच पर सम्मान का विवाद... जमीन पर बैठ गए सरपंच
गुरुवार को नगरी के श्रृंगीऋषि हाईस्कूल परिसर में सेवा संकल्प अभियान के तहत आयोजित कार्यक्रम में बैठक व्यवस्था को लेकर सरपंचों ने नाराजगी जताई...... बताया गया कि पहले उन्हें मंच पर स्थान दिया गया, लेकिन बाद में कथित तौर पर नीचे बैठने के लिए कहा गया...... बस फिर क्या था—मामला कुर्सी से निकलकर सम्मान तक पहुंच गया...... नाराज सरपंच मंच से उतर आए और कुर्सियों पर बैठने के बजाय सीधे जमीन पर बैठ गए..... अफसर समझाते रहे, मान-मनौव्वल चलता रहा, मगर तस्वीर ने अपना संदेश दे दिया था—जनता के वोट से चुनकर गांव की सरकार चलाने वाले प्रतिनिधि अपने सम्मान के सवाल पर सरकारी कार्यक्रम में जमीन पर बैठे थे।
विधायक अंबिका मरकाम का सवाल—जिला स्तरीय आयोजन और मुझे निमंत्रण तक नहीं ?
विवाद तब और गहरा गया जब सिहावा की मौजूदा विधायक अंबिका मरकाम ने कार्यक्रम की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए...... उन्होंने कहा जिला स्तरीय कार्यक्रम होने के बावजूद उन्हें निमंत्रण तक नहीं दिया गया..... साथ ही सरपंचों को मंच से नीचे उतारे जाने की घटना को निंदनीय बताते हुए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के सम्मान का मुद्दा उठाया..... अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि कौन मंच पर बैठा और कौन नीचे ?सवाल यह भी है यदि क्षेत्र की मौजूदा विधायक को जिला स्तरीय सरकारी आयोजन की सूचना अथवा निमंत्रण नहीं मिला, तो आखिर प्रोटोकॉल और संवाद की कड़ी कहां टूटी ?
और रात होते ही आदेश... बदल गया नगरी का प्रशासनिक चेहरा
दिनभर सम्मान और व्यवस्था पर सवाल उठते रहे और देर रात प्रशासनिक फेरबदल सामने आ गया...... नगरी SDM प्रीति दुर्गम की जगह मनोज कुमार मरकाम को नगरी SDM की जिम्मेदारी सौंप दी गई..... और यहीं से चर्चाओं को और हवा मिल गई..... क्योंकि मनोज मरकाम नगरी के लिए नया चेहरा नहीं हैं..... वे पहले भी यहां SDM की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और इलाके की तासीर तथा प्रशासनिक चुनौतियों से परिचित माने जाते हैं..... मगर सवाल उनके नगरी आने पर नहीं, बल्कि इतनी तेजी से बदली गई जिम्मेदारी के समय और तरीके को लेकर उठ रहा है..... जब उन्हें एक दिन पहले ही धमतरी SDM की जिम्मेदारी दी गई थी, तो आखिर ऐसा क्या बदला कि अगले ही दिन फिर नगरी भेजना पड़ा ?
अब धमतरी में नई जिम्मेदारी... कसौटी पर नई व्यवस्था
धमतरी में हाल के दिनों में कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटनाओं को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं..... ऐसे वक्त में धमतरी SDM की जिम्मेदारी डॉ. कल्पना ध्रुव को सौंपे जाने के बाद नजर इस बात पर रहेगी कि नई प्रशासनिक व्यवस्था शहर की चुनौतियों, कानून-व्यवस्था और समन्वय को किस तरह संभालती है..... किसी अधिकारी की क्षमता का पैमाना महिला या पुरुष होना नहीं, बल्कि अनुभव, निर्णय क्षमता, प्रशासनिक समन्वय और मुश्किल परिस्थितियों को संभालने की दक्षता है।
लेकिन पूरा घटनाक्रम एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ गया है—
सुबह सेवा और संकल्प का मंच था... दोपहर तक सम्मान की लड़ाई जमीन पर पहुंच गई... विधायक ने व्यवस्था पर सवाल उठाए... और रात होते-होते SDM बदल गए.... क्या यह सब महज संयोग है ? या गुरुवार की हलचल ने प्रशासन को कोई बड़ा संदेश दे दिया ? फिलहाल तबादले का आधिकारिक प्रशासनिक कारण जो भी हो, सेवा संकल्प के मंच से उठी सम्मान की आवाज अब कार्यक्रम स्थल तक सीमित नहीं रही—उसकी गूंज प्रशासनिक और सियासी गलियारों तक पहुंच चुकी है।






