जनता ने भरोसा जताया... वोट दिया... जिताया और जनप्रतिनिधि की कुर्सी तक पहुंचाया...... लेकिन अब इसी जनता के फोन से जनाब कुछ इस कदर बचते नजर आ रहे हैं कि पूरा मामला ही चर्चा का विषय बन गया है..... कहानी कुछ ऐसी है फोन की घंटी बजती है... फोन उठता है... मगर साहब अपनी आवाज में बात करने के बजाय आवाज बदलकर जवाब देते हैं— महोदय अभी मीटिंग में हैं... कार्यक्रम में हैं... या अभी बिजी हैं...... मामला यहीं खत्म नहीं होता... सबसे दिलचस्प बात तो यह है फोन रिसीव करने वाला कोई स्टाफ नहीं, बल्कि खुद जनाब ही बताए जा रहे हैं! यानी फोन भी खुद उठाना और फिर खुद के बारे में ही कहना कि साहब मीटिंग में हैं —जनाब का यह अंदाज अब लोगों के बीच खूब चर्चा बटोर रहा है...... आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि जनता से सीधे बात करने के बजाय आवाज बदलकर साहब उपलब्ध नहीं हैं का जवाब देना पड़ रहा है ? जिन लोगों ने अपने वोट की ताकत से इन्हें जनप्रतिनिधि बनाया, क्या उन्हीं लोगों से दो मिनट बात करने का वक्त नहीं है?
कहीं मंत्री के PA बनने की ट्रेनिंग तो नहीं चल रही ?
जनाब के इस अजब अंदाज पर अब लोग भी चुटकी लेने लगे हैं...... चर्चा तो यहां तक है कहीं साहब आगे चलकर किसी मंत्री के PA बनने की ट्रेनिंग तो नहीं ले रहे ? क्योंकि साहब मीटिंग में हैं, साहब कार्यक्रम में हैं, साहब अभी बिजी हैं —ये जवाब तो किसी PA की जुबान से खूब सुने जाते हैं...... लेकिन इस पूरे मामले का दूसरा पहलू भी है... जनता में इस रवैये को लेकर नाराजगी दिखाई दे रही है...... लोगों का कहना है जनप्रतिनिधि का मतलब ही जनता के बीच रहना, उनकी बात सुनना और उनकी परेशानियों को समझना है...... ऐसे में अगर जनता फोन करे और सामने से खुद जनप्रतिनिधि ही किसी और की आवाज में जवाब देने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है..... अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जनाब जनता के सामने अपनी असली आवाज में आएंगे ? या फिर अगली बार भी फोन उठेगा आवाज बदलेगी और वही जवाब मिलेगा— साहब अभी मीटिंग में हैं... फिलहाल जनाब का यह फोन वाला फंडा धमतरी के सियासी गलियारों में खूब सुर्खियां बटोर रहा है।





