धमतरी - क़ानून सबके लिए बराबर होता है... ये बात हम किताबों में पढ़ते हैं, लेकिन जब ज़मीन की रजिस्ट्री और नामांतरण की बात आती है, तो ये बराबरी जैसे कहीं गुम-सी हो जाती है.... एक ही दफ़्तर, एक जैसे कागज़ात... फिर भी दो अलग-अलग रास्ते! बिक्रीनामा की रजिस्ट्री होते ही रजिस्ट्रार ख़ुद नामांतरण कर देता है — फ़ाइल एक साँस में निपट जाती है..... लेकिन अगर वही ज़मीन दानपत्र या हकत्याग से हस्तांतरित की गई हो, तो कहानी बदल जाती है..... वही काग़ज़, वही दस्तावेज़, मगर अब किसान और आम आदमी को फिर से पटवारी और तहसीलदार के चक्कर लगाने पड़ते हैं..... कहीं कोई सुनवाई नहीं, कहीं कोई जवाब नहीं..... रजिस्ट्रार का दफ़्तर बस औपचारिकता निभाता है, जैसे किसी अदृश्य ताक़त ने नियमों को अपने हिसाब से बाँट दिया हो।
अगर बिक्रीनामा पर नामांतरण तत्काल हो सकता है, तो दानपत्र पर क्यों नहीं? — यही सवाल अब हर गाँव में गूंज रहा है..... किसानों की थकी हुई आँखों में अब उम्मीद नहीं, बस एक सवाल बाकी है —
क्या दफ़्तर का क़ायदा इंसाफ़ से बड़ा हो गया?
धीरे-धीरे यह ग़ुस्सा एक आंदोलन का रूप ले रहा है, क्योंकि आमजन अब ये समझ चुके हैं कि नियम का असली मतलब वही है, जो सत्ता चाहे।





