धमतरी। सरकारी दफ्तर अब किसी की जायदाद बनते जा रहे हैं... और जनता की पूंजी अब उनके लिए बस एक सौदे की रसीद रह गई है..... ताज़ा मामला एक ऐसे पटवारी हल्के से जुड़ा है जहाँ सरकारी दस्तावेज़ों पर निजी हाथों का कब्ज़ा है..... कहने को तो यह सरकारी दफ्तर है — लेकिन अंदर की हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
सूत्रों के मुताबिक, इस पटवारी ने अपने दफ्तर में चार अवैध निजी सहायकों को रखा है..... ये वही लोग हैं जो राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण फाइलें, और खसरा नक्शा तक संभालते हैं…
यानी, जनता की ज़मीन और जिंदगी दोनों की चाबी अब इन गैरकानूनी हाथों में है।
अदृश्य ताक़त या प्रशासन की मजबूरी ?
बड़ा सवाल यही है — आखिर कौन है वो ‘अदृश्य शक्ति’, जो इन सहायकों को तनख्वाह देता है?
कौन है वो जो कानून की आँखों में धूल झोंककर इस भ्रष्टाचार को सहारा दे रहा है?
शिकायतें कई हुईं, दस्तावेज़ तक जमा हुए, मगर प्रशासन ख़ामोश है…
जनप्रतिनिधि भी मजबूर या मौन नज़र आ रहे हैं।
क्या किसी बड़े नाम का साया है इस पटवारी पर?
या फिर सिस्टम इतना कमजोर हो चुका है कि शिकायत के बाद भी फाइलें अलमारी में ही दम तोड़ देती हैं?
आम आदमी की जद्दोजहद…
जनता परेशान है —
कोई नामांतरण करवाने महीनों से दौड़ रहा है,
कोई नक्शा निकलवाने हज़ारों खर्च कर चुका है,
फिर भी हर बार कल आना कहकर लौटा दिया जाता है।
कई ग्रामीणों का कहना है कि बिना मोटी रकम के कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती...... दस्तावेज़ सरकारी हैं, पर अब सबकुछ निजी सौदेबाज़ी में बदल गया है, एक पीड़ित ने रोते हुए कहा।
कब रुकेगा ये खेल...?
क्या प्रशासन अब भी सोता रहेगा?
क्या जनप्रतिनिधि सिर्फ मंचों पर जनसेवा की बातें करते रहेंगे?
या कभी इस निजी साम्राज्य पर भी ताला लगेगा —
जहाँ कानून बिकता है, और ईमान दफ्तर की दीवारों पर धूल खा रहा है।
यह सिर्फ एक पटवारी की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है..... जहाँ अदृश्य ताक़तें इंसाफ़ को नजरबंद कर चुकी हैं।





