धमतरी नगर निगम की सत्ता पर भाजपा का कब्जा है, लेकिन सत्ता के गलियारों में इन दिनों कुछ ऐसी फुसफुसाहटें सुनाई दे रही हैं जो आने वाले समय में बड़े राजनीतिक तूफान का संकेत मानी जा रही हैं..... बाहर से सब कुछ सामान्य और एकजुट दिखाई देने वाला निगम का माहौल अंदरखाने कई सवालों, नाराजगियों और अनकही शिकायतों से घिरा नजर आ रहा है...... चर्चाओं का बाजार गर्म है कि कुछ एमआईसी प्रभारी पूरे परिषद को साथ लेकर चलने के बजाय केवल अपने पसंदीदा और करीबी पार्षदों तक ही सीमित होते जा रहे हैं..... निगम के विभिन्न कार्यक्रमों, निरीक्षणों, भूमिपूजन, लोकार्पण और बैठकों में बार-बार वही चुनिंदा चेहरे नजर आने से कई पार्षद खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं...... यही वजह है कि अब निगम के भीतर दो अलग-अलग खेमों की चर्चा खुलकर होने लगी है..... सवाल यह उठ रहा है कि जब जनता ने सभी पार्षदों को समान अधिकार, जिम्मेदारी और भरोसे के साथ चुना है तो फिर कुछ लोगों को ही अहमियत और बाकी को उपेक्षा क्यों ? आखिर ऐसा क्या कारण है कि निगम की गतिविधियों में बार-बार वही चेहरे दिखाई देते हैं और बाकी जनप्रतिनिधि केवल दर्शक बनकर रह जाते हैं ? बताया जा रहा है कि कुछ विभागीय मामलों में भी सभी पार्षदों को विश्वास में लेने के बजाय केवल चुनिंदा लोगों तक ही जानकारी सीमित रखी जा रही है..... इस स्थिति से कई वार्डों के विकास कार्य प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है...... पार्षदों के बीच यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि यदि संवाद और सहभागिता का दायरा सीमित रहा तो जनता के हित से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट सकते हैं...... राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह केवल नाराजगी का मामला नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन का भी प्रश्न है...... यदि समय रहते बढ़ती दूरी को कम नहीं किया गया तो इसका असर निगम की कार्यप्रणाली के साथ-साथ भाजपा की अंदरूनी एकजुटता पर भी पड़ सकता है...... सत्ता पक्ष के भीतर उठ रहे सवाल विपक्ष के लिए भी बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकते हैं..... सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या कुछ एमआईसी प्रभारी अपनी अलग राजनीतिक टीम तैयार करने में जुटे हैं, या फिर यह महज एक संयोग है कि हर कार्यक्रम में वही चुनिंदा पार्षद दिखाई देते हैं ? यह सवाल अब निगम के गलियारों से निकलकर राजनीतिक हलकों में भी गूंजने लगा है..... फिलहाल कोई भी पार्षद खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है, लेकिन बंद कमरों में होने वाली बातचीत, बैठकों के बाद होने वाली कानाफूसियां और बढ़ती बेचैनी यह साफ इशारा कर रही हैं कि सत्ता के भीतर सब कुछ उतना आसान और आरामदेह नहीं है जितना बाहर से दिखाई देता है...... अब निगाहें भाजपा संगठन और निगम नेतृत्व पर टिकी हैं....... चुनौती केवल निगम चलाने की नहीं, बल्कि उन जनप्रतिनिधियों के दिलों में पैदा हो रही दूरी को मिटाने की भी है...... क्योंकि राजनीति में अक्सर बड़े विवाद शोर से नहीं, बल्कि खामोश नाराजगियों से जन्म लेते हैं... और धमतरी नगर निगम में इन दिनों ऐसी ही खामोशियां बहुत कुछ कह रही हैं।





