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सरकारी मुहर, बड़े-बड़े वादे और सपना कॉम्प्लेक्स का... लाखों रुपये जमा होने के बाद खुली ऐसी हकीकत, आखिर नगर निगम की फाइलों में कहाँ कैद हो गई जनता की जमा पूंजी?

धमतरी नगर निगम की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.... सवाल सिर्फ एक कॉम्प्लेक्स, एक जमीन या कुछ दुकानों का नहीं है... सवाल उन सैकड़ों परिवारों की उम्मीदों का है, जिन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई इस भरोसे के साथ नगर निगम के खजाने में जमा कर दी थी कि एक दिन उनकी भी अपनी दुकान होगी, उनका भी कारोबार होगा और उनके परिवार का भविष्य संवर जाएगा.... नगर निगम ने अपनी जमीन पर भव्य कॉम्प्लेक्स बनाने के सपने दिखाए..... अखबारों में आकर्षक नक्शे प्रकाशित हुए, बड़े-बड़े दावे किए गए, दुकानों के लिए टेंडर निकाले गए और लोगों को भरोसा दिलाया गया कि जल्द ही यहां व्यापारिक गतिविधियों का नया केंद्र तैयार होगा.... सरकारी संस्था पर भरोसा करते हुए लोगों ने लाखों रुपये जमा किए, रसीदें कटवाईं और अपने सपनों को सच होने का इंतजार करने लगे.... लेकिन वक्त बीतता गया और सपनों की इमारत खड़ी होने से पहले ही सवालों का पहाड़ खड़ा हो गया.... आरोप है कि जिन जमीनों को दिखाकर दुकानों के लिए टेंडर निकाले गए, उन्हीं जमीनों के जरूरी दस्तावेज और स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं थे..... अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जमीन से जुड़े कागजात दुरुस्त नहीं थे, तो आखिर टेंडर किस आधार पर निकाले गए ? जनता से लाखों रुपये किस भरोसे पर जमा कराए गए ? कई स्थानों पर कॉम्प्लेक्स निर्माण की योजनाएं वर्षों तक आगे नहीं बढ़ सकीं.... कहीं परियोजनाएं ठंडे बस्ते में चली गईं तो कहीं प्रस्ताव ही खत्म हो गए..... उधर जिन लोगों ने अपनी जमा पूंजी निगम के भरोसे सौंपी थी, वे आज भी अपनी रकम वापस पाने के लिए निगम कार्यालय के चक्कर लगाने को मजबूर हैं.... सबसे ज्यादा दर्द उन लोगों का है जिन्होंने दुकान मिलने की उम्मीद में अपनी मेहनत की कमाई जमा की थी.... आज वे न दुकान के मालिक बन सके और न ही आसानी से अपना पैसा वापस हासिल कर पाए.... कोई आवेदन लेकर अधिकारियों के सामने खड़ा है, कोई वर्षों पुरानी रसीद संभाले न्याय की आस लगाए बैठा है, तो कोई बार-बार निगम कार्यालय पहुंचकर जवाब मांग रहा है....

यह पूरा मामला अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है...

क्या जनता को सुनहरे सपने दिखाकर पैसा जमा कराना और फिर वर्षों तक उसे लटकाए रखना उचित है ? यदि परियोजनाएं पूरी नहीं हुईं तो जिम्मेदारी किसकी है ? यदि जमीन के दस्तावेज स्पष्ट नहीं थे तो फैसला किसने लिया ? और यदि लोगों का पैसा जमा कराया गया था, तो उसे समय पर वापस क्यों नहीं किया गया ? धमतरी की जनता आज जवाब चाहती है.... क्योंकि यह मामला केवल पैसों का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो लोगों ने एक सरकारी संस्था पर किया था..... सवाल यह भी है कि आखिर नगर निगम की फाइलों में जनता की जमा पूंजी कब तक कैद रहेगी और वर्षों से भटक रहे लोगों को उनका हक कब मिलेगा ? अब निगाहें जिम्मेदार अधिकारियों और प्रशासन पर टिकी हैं.... क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी ? क्या दोषियों की जवाबदेही तय होगी ? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पीड़ितों को उनकी जमा पूंजी वापस मिल पाएगी ? फिलहाल यह सवाल धमतरी की गलियों से लेकर नगर निगम के दफ्तरों तक गूंज रहा है कि आखिर जनता की मेहनत की कमाई का हिसाब कौन देगा?



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